चालू परियोजनाएं


क्र. सं. शीर्षक प्रधान अन्वेषक द्वारा वित्त पोषित
1. कृषि प्रसार एवं परामर्श प्रणालियों का प्रदर्शन एवं प्रभाव आकलन
(01-04- 2017 to 31-03-2020)

कृषि में एक बहुलवादी प्रसार और परामर्शी सेवा (EAS) प्रावधान के परिदृश्य में परियोजना का उद्देश्य विभिन्न प्रसार एवं परामर्शी सेवा प्रणालियों के प्रदर्शन का आकलन करना और खेत उपज/आय पर इसके प्रभाव का अनुमान लगाना है। कृषि परामर्शी सेवा प्रावधान में सूचना व संचार प्रौद्योगिकि(ICTs) जैसे आधुनिक टूल्सं की प्रभावशीलता का विश्लेषण करने के प्रयास को भी अध्य यन के भाग के तौर शामिल किया जाएगा।
सुश्री आरती अशोक भाकृअनुप – राष्ट्रीय कृषि आर्थिकी एवं नीति अनुसंधान संस्थान (ICAR-NIAP)
2. भारत में तम्बााकू के कृषि अर्थशास्त्र पर एक अध्ययन
(03- 08-2016 to 28-02- 2017)

तम्बााकू में भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उत्पा्दक और छठा सबसे बड़ा निर्यातक राष्ट्र है । तम्बाकू के उत्पादन, प्रसंस्क‍रण और खपत से जुड़े स्वास्य खतरों के बावजूद यह अनेकों किसानों के लिए आजीविका का स्रोत बना हुआ है। इस परियोजना में स्वास्य् – आजीविका पहलुओं को ध्यान में रखकर भारत में तम्बा्कू सस्यविज्ञान की वर्तमान स्थिति की जांच करने का प्रयास किया जाता है। साथ ही इसमें तम्बा्कू सस्यविज्ञान पर तम्बाकू नियंत्रण उपायों का मूल्यांकन करने का प्रयास भी किया जाता है।
डॉ. उषा रानी आहुजा परामर्शी सेवा, विश्व् स्वास्थ्य संगठन ( WHO)
3. सामाजिक-आर्थिक एवं सामाजिक-निजी गुणों का पाथवे की पहचान करना और भारत में विभिन्न कृषि इकोसिस्टम में कृषि प्रदर्शन पर इनके प्रभाव का अध्ययन करना
(03-08- 2016 to 31-03- 2017)

कृषि कार्यों में आय का सृजन काफी हद तक प्रौद्योगिकियों को अपनाने के स्त र पर निर्भर करता है जो कि विभिन्न सामाजिक-आर्थिक, सामाजिक-निजी एवं कृषि इकोलॉजिकल कारकों द्वारा प्रभावित होता है। प्रौद्योगिकियों का प्रसार एवं उनका आकलन करते समय किसान समुदाय की सामाजिक-आर्थिक एवं भौगोलिक विशेषताओं की भूमिका को बहुत अधिक प्रोत्साहन नहीं दिया गया है । अध्ययन का उद्देश्य ग्रामीण सेटिंग की गतिशीलता को बेहतर तरीके से समझना और देश के विभिन्ना कृषि इकोसिस्टाम में सामाजिक – आर्थिक एवं सामाजिक – निजी पैटर्न का मानचित्रण करने के लिए पाथवे का पता लगाना है।
डॉ. नवीन प्रकाश सिंह बाह्य, भाकृअनुप – एकस्ट्रामुराल
4. कपास इकोसिस्टम में भावी जिंस बाजार के लाभों का मूल्यांकन
(01-07-2016 to 31-01-2017)

तम्बाकू के तहत खेती क्षेत्रफल कुल फसल क्षेत्रफल का मात्र 0.25 प्रतिशत है जो पिछले तीन दशकों से लगातार घट-बढ़ रहा है। तम्बा्कू के खेती क्षेत्रफल में पिछले वर्ष के मूल्यों का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। तम्बाकू की उपज बढ़ने के परिणामस्वरूप तम्बाकू के उत्पादन में वृद्धि हुई है जो कि वर्ष 1970-71 में 362 000 टन थी और वर्ष 1997-98 में 646 000 टन थी।
डॉ. नवीन प्रकाश सिंह बाह्य MCX, मुम्ब8ई, परामर्शी सेवा
5. भारत में कृषि शिक्षा पर आईसीटी का प्रभाव
(06-04-2016 to 31-03-2017)

भारत में कृषि शिक्षा द्वारा कृषि सेक्टंर में महसूस की जा रहीं प्रमुख चुनौतियों का सामना करने के लिए मानव संसाधन को समर्थ बनाने में महत्वनपूर्ण भूमिका निभाई जा रही है। कृषि में उच्चंतर शिक्षा में आईसीटी के महत्व को अंगीकार करते हुए भाकृअनुप द्वारा ई-संसाधनों के विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है जिससे कम समय में ही सूचना को एकत्रित करने और उसे साझा करने में मदद मिलती है। इस परियोजना का उद्देश्य कृषि शिक्षा में उपयोग किए जाने वाले विभिन्न आईसीटी संसाधनों को दस्तागवेजी रूप देना; इनके प्रभाव का आकलन करना; एवं कृषि शिक्षा में ऐसे टूल्स की बढ़ी हुई उपयोगिता के लिए नीतियों का विकास करना है।
डॉ. रजनी जैन बाह्य, भाकृअनुप – एक्ट्राि मुराल
6. उत्तर भारत में हितधारकों की प्रभावशीलता व समग्रता में सुधार करने के लिए सिंचाई जल प्रबंधन प्रणालियों में संस्थागत नवोन्मेष
(13-01-2016 to 13-04-2017)

खाद्य की लगातार बढ़ रही मांग को पूरा करने के लिए कृषि में जल उपयोग प्रभावशीलता में सुधार लाने हेतु तकनीकी, संस्थागत नवोन्मेष, जल नीतिऔर प्रबंधन सुधार की भूमिका महत्वंपूर्ण है। भारत में जल की बचत करने वाली सिंचाई प्रणालियों का प्रयोग बढ़ रहा है लेकिन अभी भी सिंचाई के प्रयोजन हेतु भूजल पर बहुत ज्यादा निर्भरता टिकी हुई है। हालांकि, सिंचाई के क्षेत्र में अनेक नवोन्मेाषी संस्थान उभर कर सामने आ रहे हैं लेकिन इनमें से काफी संस्था्नों में कानूनी फ्रेमवर्क, स्पष्ट दिशानिर्देश एवं ऑपरेशनल कार्यविधि के अभाव में उत्साहजनक परिणाम देखने को नहीं मिले। इस संदर्भ में, इस अध्य्यन की योजना सिंचाई जल प्रबंधन, इनकी बाधाओं व सुधारात्मक उपायों में संस्था्गत नवोन्मेष का आकलन करना; उभर रहीं सिंचाई जल प्रबंधन प्रणालियों की संसाधन उपयोग प्रभावशीलता, न्यायसंगतता तथा टिकाऊ क्षमता का आकलन करना है।
डॉ. सुभाष चन्दऊ बाह्य, भाकृअनुप – एकस्ट्रा मुराल
7. भारतीय कृषि की अनुकूलनता को बढ़ाने हेतु विकास योजना में अनुकूलन नीतियों को मुख्य धारा में लाना
(01-08-2015 to 31-03-2017)

जलवायु परिवर्तन के क्षमताशील प्रतिकूल प्रभावों के बारे में बढ़ रही जागरूकता की प्रतिक्रिया में हालिया वर्षों में अनुकूलन कार्रवाई में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। बड़ी संख्या में राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली द्वारा प्रौद्योगिकियों एवं रीतियों का विकास किए जाने के बावजूद किसानों द्वारा महसूस की गईं विभिन्न बाधाओं के कारण इन्हें अपनाने का स्त र अभी भी कम बना हुआ है। अक्सर कृषि विकास नीति में अनुकूल कार्रवाई की योजना का अभाव रहता है और वे विभिन्न क्रियान्वयन एजेन्सियों और कार्य करने वालों के बीच फैली होती हैं जिससे जलवायु अनुकूलन नीतियों में सामंजस्य के अभाव का पता चलता है। इस परियोजना का उद्देश्य वर्तमान जलवायु अनुकूलन नीतियों, कार्यक्रमों व संस्थागत क्रियाविधियों की समीक्षा करना; अनुकूलन रणनीतियों के विभिन्न अवरोधों की पहचान करना; अनुकूलन रणनीतियों को प्राथमिकता देना; एवं विकास योजना में अनुकूलन नीतियों को मुख्य धारा में लाने के एक फ्रेमवर्क का सुझाव देना है।
डॉ. नवीन प्रकाश सिंह बाह्य, NICRA
8. भारत में गेहूं की तकनीकी प्रभावशीलता एवं अनुसंधान उत्पादकता का आकलन
(01-08-2015 to 31-07-2017)

चावल के उपरान्त गेहूं सबसे बड़ी खाद्य फसल है और लगातार बढ़ रही जनसंख्या , शहरीकरण, जीवनचर्या व आहारीय पैटर्न में बदलाव, प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि आदि जैसे अनेक कारकों के कारण इसकी मांग में लगातार वृद्धि हो रही है। गेहूं की बढ़ रही मांग को पूरा करने के लिए इसकी आपूर्ती में वृद्धि करना अनिवार्य हो गया है और वर्तमान अध्ययन का उद्देश्य गेहूं की खेती करने वाले प्रमुख राज्यों के बीच उत्पादन प्रभावशीलता का विश्लेषण करके गेहूं में उत्पा्दन वृद्धि के स्रोतों का आकलन करना है। अध्ययन के तहत गेहूं अनुसंधान पर किए जाने वाले सार्वजनिक निवेश से मिलने वाले लाभ का अनुमान भी लगाने का प्रयास किया जाता है जैसा कि यह गेहूं के अनुसंधान व विकास में भावी निवेश का निर्धारण करने में महत्वपूर्ण है।
डॉ. किंग्सले इम्मानुलराज टी. भाकृअनुप – राष्ट्रीय कृषि आर्थिकी एवं नीति अनुसंधान संस्थान (ICAR-NIAP)
9. भारत में आलू के अनुसंधान व विकास पर किए गए अनुसंधान निवेश पर लाभ
(01-07-2015 to 30-06-2016)

भारत में चावल, गेहूं व मक्काक के उपरान्त आलू चौथी प्रमुख खाद्य फसल है। भारत, आलू का दूसरा सबसे बड़ा उत्पाखक राष्ट्र है और राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली द्वारा आलू के अनुसंधान व विकास पर उल्लेखनीय निवेश किया जाता है। यह परियोजना भारत में आलू के अनुसंधान व विकास निवेश से मिलने वाले आर्थिक लाभ का आकलन करने का एक विहंगम प्रयास है।
डॉ. राजेश कुमार राणा भाकृअनुप – राष्ट्रीय कृषि आर्थिकी एवं नीति अनुसंधान संस्थान (ICAR-NIAP)
10. कृषि में महिलाओं की भूमिका एवं विश्वसनीयता का लिंग भिन्नात्मक अनुभव
(01-01-15 to 30-06-2016)

महिलाओं द्वारा कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्रों में उल्लेखनीय एवं महत्व्पूर्ण भूमिका निभाई जाती है लेकिन इस तथ्य् को लंबे समय से अनदेखा किया गया है। विभिन्नि क्षेत्रों के बीच कृषि में महिलाओं की भागीदारी की प्रकृति एवं दायरा अलग-अलग है और इनकी भूमिका को भिन्न सामाजिक-आर्थिक कारक भी प्रभावित करते हैं। कृषि उत्पादन में महिलाओं के योगदान पर सटीक जानकारी का होना प्रभावी उत्पादन योजना बनाने में महत्वपूर्ण है और इस परियोजना का उद्देश्यओ कृषि में महिला विशिष्ट‍ भूमिकाओं का दस्तावेजीकरण करना तथा पूर्वी भारत के ग्रामीण किसान परिवारों के बीच विश्वसनीयता में लिंग भिन्नात्मक अनुभवों का विश्ले‍षण करना है।
डॉ. उषा रानी आहुजा भाकृअनुप – राष्ट्री य कृषि आर्थिकी एवं नीति अनुसंधान संस्थािन (ICAR-NIAP)
11. कृषि अनुसंधान एवं विकास का प्रभाव आकलन
(01-01-2015 to 31-03-2017)

समय के साथ-साथ विविधीकरण के अलावा बेहतर उत्पादन, उपज, गुणवत्ता उत्पाद के लिए कृषि क्षेत्र में अनेक नवोन्मेष अथवा इनोवेशन का विकास किया गया। अभी हाल ही में, सार्वजनिक अनुसंधान व विकास निवेश के प्रति बढ़ती चिंता के साथ किसान समुदाय पर प्रभाव रखने वाले इन नवोन्मे षों के परिणामों, आउटकम तथा कार्रवाई पर कहीं अधिक बल दिया जा रहा है। परियोजना का प्रयास साक्ष्य आधारित नीति तैयार करने के लिए अग्रणी एवं क्षमताशील कृषि उत्पाादन प्रौद्योगिकियों के प्रभाव का मूल्यांकन करना और त्वपरित एवं बेहतर अनुसंधान परिणामों के लिए इस डोमेन में मानव संसाधन क्षमता को मजबूती प्रदान करना है।
डॉ. शिव कुमार नेटवर्क, भाकृअनुप-एसएसएन
12. संसाधन उपयोग प्रभावशीलता एवं टिकाऊ क्षमता में सुधार लाने के लिए क्षेत्रीय फसल योजना
(01-07-2013 to 31-03-2017)

लगातार बढ़ रही जनसंख्या और प्रति व्यक्ति कम होती जा रही जमीन की उपलब्धता ने भारतीय कृषि में फसलचक्र के सघनीकरण को अविलम्बत अपनाने की जरूरत पर ध्यान आकर्षित किया है। इसके साथ ही, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ रहे दबाव, उत्पादन के व्यावसायीकरण, खेती के लिए ऊर्जा व अन्य खरीद निवेशों के उच्चतर उपयोग ने मूल्यों में उतार-चढ़ाव के बिना संसाधनों के इष्टतम उपयोग की अनिवार्यता उत्पन्न कर दी है। इस परियोजना का प्रयास विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न् फसलों की उपयुक्तता की दिशा में अंत र्दृष्टि हासिल करने के लिए आर्थिक मूल्यों व प्राकृतिक संसाधन उपयोग के संबंध में विभिन्न फसलों व फसलचक्र प्रणालियों के क्षेत्रीय प्रदर्शन की तुलना करना है। साथ ही इस परियोजना का प्रयास टिकाऊ कृषि उत्पा्दन एवं बेहतर संसाधन उपयोग प्रभावशीलता के लिए क्षेत्रों के बीच भिन्न फसलों में इष्टतम भूमि आवंटन योजना तैयार करना है।
डॉ. रजनी जैन नेटवर्क, भाकृअनुप-एसएसएन
13. राष्ट्रीय कृषि नवोन्मेषी निधि
(01-04-2013 to 31-03-2017)

अध्ययन में भारत के साथ-साथ विश्व स्तर पर कृषि अनुसंधान एवं विकास के विभिन्न पहलुओं पर पेटेन्ट विश्लेषण करना जिसमें कि पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण (PPV&FRA) में सेवा के पहले दशक के अंतर्गत किस्मीय पंजीकरण प्रक्रिया के संबंध में प्रदर्शन पर अध्ययन करना भी शामिल है। देश में गुणवत्ता बीज सुनिश्चित करने के लिए बीज आलू उत्पा्दन के लिए ऐरोपॉनिक्सर अथवा वायव संवर्धन प्रौद्योगिकी एवं इसकी व्यवसायीकरण प्रक्रिया का SWOT विश्लेषण भी किया जाएगा। अन्य संस्थानों में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की बौद्धिक सम्पदा अधिकार संरक्षित प्रौद्योगिकियों के मूल्य् निर्धारण की प्रक्रिया में बौद्धिक निवेश प्रदान किया जाएगा। विभिन्न भाकृअनुप संस्थानों और राज्य कृषि विद्यालयों के प्रकाशनों की मात्रा का विश्लेषण किया जाएगा।
डॉ. राजेश कुमार राणा भाकृअनुप, आईपीआर एवं टीएम
14. बाजार बुद्धिचातुर्य पर नेटवर्क परियोजना
(01-04-2013 to 31-03-2017)

हालिया वर्षों में, कृषि जिंस मूल्यों में भारी उतार-चढ़ाव और स्थावनिक भिन्नंता देखने को मिली है जिससे किसान समुदाय द्वारा महसूस किए गए जोखिम में बढ़ोतरी हुई। जिंस की आपूर्ति और मांग का अन्दरूनी खेल प्रचलित मूल्य निर्धारित करता है और क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक और नीतिगत कारक भी इसे प्रभावित करते हैं। इस अध्ययन का उद्देश्य प्रमुख कृषि जिंसों के लिए लॉजिकल एवं वैज्ञानिक मूल्यय पूर्वानुमान उत्पन्न करना और इसे देश के विभिन्न भागों के किसानों के बीच प्रसारित करना है। इससे किसानों को बुद्धिमत्ताी निर्णय लेने में मदद की जा सकती है और साथ ही इससे बाजार की बुनियादी सुविधाओं को मजबूती प्रदान करने में व हितधारकों के मार्केटिंग निर्णय को सहयोग देने में भी मदद मिलेगी।
डॉ. राका सक्सेना नेटवर्क, भाकृअनुप-एसएसएन
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